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#मेरेJazबात @SwarVidrohTimes मेरे जीवन के वो 15 मिनट…

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#मेरेJazबात @SwarVidrohTimes

उत्तर प्रदेश : अलीगढ़
05 मार्च 2022 :

मेरे जीवन के वो 15 मिनट…

यह मेरा जन्मदिवस था… 16 मई
वर्ष था 2020 वैश्विक कोरोना महामारी काल चल रहा था, हर तरफ भय का वातावरण व्याप्त था । मृत्य का भय मानो प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क पर चढ़कर तांडव कर रहा था ।

16 मई 2020 को जो कुछ भी मेरे साथ घटित हुआ उसने मेरा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित कर दिया, आस्तिक से नास्तिक बन चुका मैं दुनिया भर के दुःखों को अपना समझ आत्महत्या करने की ठान बैठा था ।

यह मेरे जीवन के सबसे निर्णायक क्षणों के वो 15 मिनट थे…
प्रारम्भ के 5 मिनट तो मुझे लगा कि ईश्वर ने इस संसार के सभी दुःख मुझे ही दे दिये हैं, यह अब मेरे बर्दाश्त से बाहर हैं और अब मुझे इस दुःख भरे जीवन को त्याग देना चाहिए । मेरे जीवन के सभी अच्छे बुरे पल मानो मेरी आँखों के सामने एक फिल्म की तरह आने लगे थे ।

अगले 5 मिनट मैं विचार कर रहा था कि मेरी मृत्यु के बाद किस-किस की कैसी-कैसी प्रतिक्रिया होगी, यह सब विचार करने के बाद मैं डिप्रेशन में आकर सबकुछ भूलकर ब्लेड से अपने हाथ की नस काटने जा ही रहा था तभी जो हुआ यह अद्भुत, अकल्पनीय तथा विस्मृति कर देने वाला क्षण था ।

यह उन 15 मिनट के अंतिम 5 मिनट थे, एक अलौकिक प्रकाश मेरे अंधेरे कमरे में पता नहीं कहा से आने लगा था उस प्रकाश की चमक से मेरी आंखों के आगे सब धुँधला धुँधला सा नजर आ रहा था, तभी ऐसा अनुभव हुआ जैसे किसी ने मेरा वो हाथ पकड़ लिया हो जिस हाथ में ब्लेड लगा हुआ था लेकिन उस अलौकिक प्रकाश के कारण मैं कुछ भी देख पाने में असमर्थ हो चुका था ।
कुछ ही क्षण के बाद मुझे एक मनमोहक वाणी सुनाई देती है “हे पार्थ”
अब मैं पूरी तरह आश्चर्य से भर चुका था क्योंकि वो किसी और की नहीं अपितु स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण जी वाणी थी ।
अद्भुत पल था वह मेरे लिए… मेरे होंठ कांप रहे थे, रोम रोम सिहर उठा था, आँखों से स्वत: ही अश्रु की धारा बहने लगी थी, प्यास से मेरा कंठ सूखने लगा था और मस्तिष्क एकदम स्थिर और शांत हो चुका था।
श्रीकृष्ण जी ने दुबारा कहा ” हे पार्थ ” ये तुम क्या अनर्थ करने जा रहे थे, मनुष्य योनि का यह अनमोल जीवन मैंने तुम्हें दिया और इस अनमोल जीवन को तुम इन भौतिकवादी मनुष्यों के लिए त्यागने जा रहे थे जिनका कार्य ही है बोलना ।
तुम बुरा करोगे तब भी यह बोलेंगे,
अच्छा करोगे तब भी यह बोलेंगे,
और
कुछ नहीं करोगे तब भी यह अवश्य बोलेंगे ।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

अर्थात
सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा । मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर ।

व्यर्थ की चिंता छोड़ मेरे प्रिय मित्र और मेरी शरण में आ जा ।

यह सुनने के उपरान्त मेरे शरीर में एक अद्भुत सात्विक ऊर्जा व्याप्त हो चुकी थी, वह अलौकिक प्रकाश भी अब मेरी नजरों से ओझल हो चुका था साथ ही वो मनमोहक वाणी भी अब सुनाई देना बंद हो चुकी थी।

ठीक उसी पल मैंने यह निश्चय किया कि भूलवश भी अब कभी मैं आत्महत्या करने का विचार तक अपने मन में नहीं आने दूँगा साथ ही मैंने यह प्रण किया कि अभी से मेरा यह जीवन मैं परम भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दूँगा ।
श्रीकृष्ण जी के नए नए भक्त बनाने का कार्य करूंगा एवं सनातन धर्म का सही प्रचार प्रसार करूंगा जिससे कि सभी मनुष्य अंधविश्वास से ऊपर उठकर वास्तविक ईश्वर यानी कि योगेश्वर श्रीकृष्ण जी की भक्ति करें ।

निष्कर्ष :
जीवन की समस्याओं से भागकर आत्महत्या करना किसी भी दुःखमय परिस्थिति में उचित विकल्प हो ही नहीं सकता, यह जीवन मेरे माधव की देन है इसको ठाकुर जी की सेवा करने में ही लगाईये ।

जय श्री कृष्ण चैतन्य
प्रभु नित्यानंद
श्री अद्वैत गदाधर
श्रीवास आदि
गौर भक्त वृन्द

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ॥

राधे राधे मित्रों ? यदि आपको मेरी आत्मकथा अच्छी लगी हो तो इसे सभी व्यक्तियों तक पहुंचाने का कार्य करें । मेरी आत्मकथा को पढ़कर किसी एक मनुष्य का जीवन भी यदि सुधर जाए या बच जाए तो हमारा यह जीवन सफल हो जाएगा ।

हरे कृष्ण ?


कृष्णभक्त अभिषेक सक्सैना
हरिगढ़ महानगर उत्तरप्रदेश

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